वन और जीवन (Forest and Life) दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं। वनों से हमें शुद्ध ऑक्सीजन मिलती है और मनुष्य और अन्य किसी भी प्राणी का जीवन ऑक्सीजन के बिना नहीं चल सकता। वृक्ष भू-जल (Ground water) को भी संरक्षित करते हैं। जैव-विविधता की रक्षा भी वनों की रक्षा से ही संभव है। विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए बहुमूल्य वनौषधियां हमें जंगलों से ही मिलती हैं।

दुनिया में जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिक विकास और आधुनिक जीवन शैली की वजह से प्राकृतिक वनों पर मानव समाज का दबाव बढ़ता जा रहा है। इसे ध्यान में रखकर मानव जीवन की आवश्यकताओं के हिसाब से वनों के संतुलित दोहन तथा नए जंगल लगाने के लिए भी विशेष रूप से काम करने की जरूरत है। जंगलों को आग से बचाना भी जरूरी है।

पर्यावरण को कई तरह से लाभ पहुंचाते हैं वन : 
हरेभरे पेड़-पौधे, विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, मिट्टी, हवा, पानी, पठार, नदियां, समुद्र, महासागर आदि सब प्रकृति की देन हैं, जो हमारे अस्तित्व एवं विकास के लिए आवश्यक हैं। वन पर्यावरण, लोगों और जंतुओं को कई प्रकार से लाभ पहुंचाते हैं। जिसमें वन हमें भोजन ही नहीं वरन् जिंदगी जीने के लिए हर जरूरी चीज मुहैया कराते हैं।

पेड़ पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं और पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करते हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई (Indiscriminate felling of trees) एवं सिमटते जंगलों (Shrinking forest) की वजह से भूमि बंजर (Barren Land) और रेगिस्तान (Desert) में तब्दील होती जा रही है, जिससे दुनियाभर में खाद्य संकट का खतरा मंडराने लगा है। वन न केवल पृथ्वी पर मिट्टी की पकड़ बनाए रखता है, बल्कि बाढ़ को भी रोकते और मृदा को उपजाऊ बनाए रखता है।

 
वर्तमान में दुनिया के 7 अरब लोगों को प्राणवायु (Oxygen) प्रदान करने वाले जंगल खुद अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विशेषज्ञों की राय है कि यदि जल्द ही इन्हें बचाने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो ग्लोबल वार्मिंग, अतिवृष्टि, अनावृष्टि तथा अल्पवृष्टि जैसी समस्याएं विकराल रूप ले लेंगी। 

पेड़ पौधों के नष्ट होते ही हमार विनाश निश्चित : 
सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरनमेंट (सीएसई) की एक रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि देश में 18 पेड़ काटे जाते हैं, तो एक पेड़ लगाया जाता है। पर्यावरण संरक्षण भारतीय संस्कृति की सनातन परम्परा है। पौधों का रोपण और देखभाल एक सामुदायिक एवं आध्यात्मिक गतिविधि है।

अतः हर नागरिक का यह धर्म है कि वह वनों की रक्षा करे और वानिकी का विकास करे। वन संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और संवर्धन से हम भावी पीढ़ी का जीवन सुरक्षित रख सकेंगे। हमें अगर जिन्दा रहना है, तो प्रकृति से प्रेम करें और उसे बचाने के लिए हर संभव कोशिश करें। पेड़−पौधे रहेंगे तो हमारा वजूद रहेगा। उनके नष्ट होते ही मानव सभ्यता का भी पतन निश्चित है।

मानव सभ्यता बचाने एक तिहाई वन संरक्षित करने की जरूरत :
आज पृथ्वी पर लगभग 11 प्रतिशत वन संरक्षित हैं, जो विश्व पर्यावरण की नजर से बहुत ही कम है। स्वस्थ्य पर्यावरण हेतु पर पृथ्वी पर लगभग एक तिहाई वनों का होना अति आवश्यक है, लेकिन मानवीय विकास की अन्धी होड़, जनसंख्या विस्फोट एवं औद्योगिक वृद्धि के कारण मानवीय आवश्यकताओं व गलत वन नीतियों के कारण वनों के क्षेत्रफल में लगातार कमी आ रही है। जो एक विश्व स्तरीय समस्या बन चुकी है।

पृथ्वी से मानव ने आज तक सब कुछ लिया ही है दिया कुछ भी नहीं है। यदि हम समय रहते नहीं सजग हुए तो पृथ्वी पर पर्यावरणीय संकट और भी गहरा हो सकता है। पेड़ संस्कृति के वाहक हैं, प्रकृति की सुरक्षा से ही संस्कृति की सुरक्षा हो सकती है। हमें बेकार पड़ी भूमि पर वृक्ष लगाने चाहिए तथा ब्लैंक प्लांटटेंशन एवं टेरेस प्लांटटेंशन पर जोर देना चाहिए। शहरों और गांवों में भी पर्याप्त मात्रा में पेड़-पौधे लगाने चाहिए। सरकार को भी वनों की अवैध कटाई पर रोक लगानी चाहिए। अंत मे मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि

नदी, निर्झर और नाले                         
इन वनों ने हैं गोद में पाले                        
प्रकृति के इन धरोहरों को                    
आओ साथ मिलकर हम बचा लें

(StackUmbrella के लिए विशेष रूप से) 

 
-राहुल रोहित,
पक्षी  विशेषज्ञ एवं युवा पर्यावरणविद्,
लहेरी टोला,
भागलपुर, बिहार

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