मध्य प्रदेश का सिंगरौली जिला देशभर में ऊर्जाधानी के नाम से जाना जाता है। यहां स्थित बड़े बिजली संयंत्र और खनन परियोजनाएं प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन विकास और आधुनिक सुविधाओं के तमाम दावों के बीच जिले के एक गांव की तस्वीर कई सवाल खड़े करती है।
सिंगरौली के खैराही गांव में आज भी सैकड़ों लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि ग्रामीणों को अपनी प्यास बुझाने के लिए गड्ढों में जमा पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिस पानी का उपयोग ग्रामीण पीने के लिए करते हैं, उसी स्रोत से जानवर भी अपनी प्यास बुझाते हैं।
भीषण गर्मी में गड्ढों का पानी बना सहारा
खैराही गांव की आदिवासी बस्ती में गर्मी बढ़ने के साथ पानी का संकट और गहरा गया है। गांव के लोगों के पास पीने के लिए कोई स्थायी जल स्रोत उपलब्ध नहीं है। ऐसे में ग्रामीण नदी किनारे बने गड्ढों में रिसकर जमा होने वाले पानी को इकट्ठा कर अपनी जरूरतें पूरी कर रहे हैं। पानी लाने के लिए महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को तेज धूप में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई बार घंटों की मशक्कत के बाद ही परिवार के लिए पर्याप्त पानी जुटाया जा सकता है।
एक ही पानी पर निर्भर इंसान और पशु
गांव की सबसे दर्दनाक तस्वीर तब सामने आती है जब इंसान और जानवर दोनों एक ही गड्ढे के पानी पर निर्भर दिखाई देते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मजबूरी ऐसी है कि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। स्थानीय निवासी ललन सिंह बताते हैं कि बचपन से लेकर आज तक गांव के अधिकांश लोग इसी पानी का उपयोग कर रहे हैं। उनके मुताबिक नदी किनारे रहने वाले 100 से अधिक परिवार वर्षों से इसी जल स्रोत के भरोसे जीवन गुजार रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गर्मियों में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
कई बार उठाई गई समस्या, नहीं मिला समाधान

गांव के सरपंच मुश्ताक अहमद का कहना है कि इस समस्या को लेकर कई बार प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को जानकारी दी जा चुकी है। उन्होंने बताया कि गांव में जल संकट को दूर करने के लिए सर्वे भी कराया गया, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।
सरपंच के अनुसार, आदिवासी बस्ती में पेयजल की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। इसके लिए कई बार बजट की मांग भी की गई, लेकिन परियोजना को अब तक मंजूरी नहीं मिल सकी है।
विधायक ने दिया समाधान का भरोसा
देवसर विधानसभा क्षेत्र के विधायक राजेंद्र मेश्राम ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि क्षेत्र में पेयजल संकट की शिकायतें बहुत कम हैं, लेकिन यदि किसी गांव में इस प्रकार की समस्या है तो तत्काल राहत पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि सरकार की नल-जल योजनाओं पर तेजी से काम चल रहा है और अधिकांश क्षेत्रों में पेयजल व्यवस्था बेहतर हुई है। यदि कोई बस्ती अभी भी इस सुविधा से वंचित है तो उसकी समस्या को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने का प्रयास किया जाएगा।
विकास के दावों के बीच बड़ा सवाल

देश को बिजली देने वाले सिंगरौली में यदि आज भी लोग पीने के पानी के लिए गड्ढों पर निर्भर हैं, तो यह विकास के दावों पर सवाल खड़े करता है। आधुनिक परियोजनाओं और औद्योगिक विकास के बीच बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करती यह आदिवासी बस्ती प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से जवाब मांग रही है।
गांव के लोगों की उम्मीद अब सिर्फ इस बात पर टिकी है कि उनकी वर्षों पुरानी पेयजल समस्या का जल्द समाधान निकले और उन्हें भी स्वच्छ पानी की सुविधा मिल सके।
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