नर्मदा जयंती विशेष: भारत की पावन भूमि पर अनेकों नदियां बहती हैं। प्रत्येक नदी की जलधारा साक्षात चेतना की प्रवाहित धारा है। परंतु शास्त्रों में एक ऐसी देवी का वर्णन किया गया है जिसकी जयंती मनाई जाती है। जयंती का अर्थ होता है प्राकट्य महोत्सव और मां नर्मदा का प्राकट्य महोत्सव हर वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है। मां नर्मदा की पवित्रता का उल्लेख सबसे अलग है। जहां गंगा की पवित्रता के लिए उसमें डुबकी मारना जरूरी है वही मां नर्मदा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए केवल दर्शन की आवश्यकता है।
मां नर्मदा का उद्गम शिव के तप से हुआ और यह शिव की दिव्य शक्ति कही जाती हैं। इन्होंने सारे नियम तोड़कर पश्चिम की ओर बहना चुना। धर्म विज्ञान और आस्था तीनों की सीमाएं लांघती हुई मां नर्मदा मानव को आत्मबोध कराती हैं। माघ माह की सप्तमी को मां नर्मदा जयंती हमें स्मरण कराती है कि यह कोई साधारण नदी नहीं बल्कि एक विशेष नदी है जिसके कण कण में शंकर बसे हैं जो कलयुग में प्रत्यक्ष मोक्षदायिनी देवी है।
क्यों अलग है मां नर्मदा?
मां नर्मदा उन नदियों में से एक है जो पूर्व की बजाय पश्चिम में बहती हैं। मां नर्मदा अमरकंटक के मैकल पर्वत से निकलकर अरब सागर में विहीन हो जाती हैं और यह अपने आप में ही बहुत बड़ा भौगोलिक चमत्कार है। यही कारण है की मां नर्मदा को उल्टी धारा वाली देवी कहा जाता है। मां नर्मदा को शिव की पुत्री और शक्ति का प्रतीक कहा जाता है क्योंकि मां नर्मदा शिव के पसीने की बूंद से प्रकट हुई थी।
भारत की एकमात्र नदी जिनकी परिक्रमा होती है
भारत में गंगा स्नान की महिमा है, यमुना दर्शन की महिमा है सरस्वती के स्मरण की परंपरा है लेकिन मां नर्मदा की परिक्रमा की जाती है। मां नर्मदा की परिक्रमा 2600 किलोमीटर लंबी होती है और इसे सबसे कठिन परंतु पुण्यदायी यात्रा में गिना जाता है। कहा जाता है की गंगा 3 दिन में पवित्र करती है यमुना 7 दिनों में लेकिन मां नर्मदा तुरंत शुद्ध कर देती है। केवल उनके दर्शन से ही जीव को मोक्ष मिलता है।
मां नर्मदा से जुड़े कुछ अनजाने भौगोलिक तथ्य
नर्मदा भारत की 5वीं सबसे लंबी नदी और सबसे अधिक स्थिर ढलान वाली नदी मानी जाती है। माता नर्मदा का बेसिन विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के बीच है। इसी वजह से यह प्राकृतिक रूप से संतुलित नदी कही जाती है। मां नर्मदा को भारत की सबसे प्राचीन मानव सभ्यता में से एक माना जाता है। इसके किनारे लाखों वर्ष पुराने अवशेष भी मिले हैं। नर्मदा नदी के दोनों ओर संगमरमर की चट्टाने पाई जाती है जो दुनिया में अत्यंत दुर्लभ हैं। नर्मदा स्वयं इन जटिल पत्थरों को बीच से तराशती हुई बहती है।
नर्मदा और शिवलिंग का रहस्य
पुराणों में वर्णित है की माता नर्मदा से मिलने वाला प्रकृति प्रत्येक पत्थर शिवलिंग है। इन्हें बाणलिंग कहा जाता है। यह लिंग मानव द्वारा नहीं बनाए जाते, बल्कि नदी का पानी इन्हें शिवलिंग जैसा आकार देता है। इन बाणलिंगों में शिव का वास होता है इन्हें किसी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती बल्कि इन्हें मंदिर में रखकर पूजा की जा सकती है नर्मदा के बिना बाणलिंग की कल्पना अधूरी है, इसलिए इन्हें नर्मदेश्वर कह कर सम्बोधित किया जाता है।
शास्त्रों में नर्मदा की महिमा
स्कंद पुराण में माता नर्मदा के लिए एक पूरा समर्पित खंड रचा गया है। मत्स्य पुराण में माता नर्मदा को गंगा से भी अधिक पुण्य कहा गया है। ब्रह्म पुराण में नर्मदा के जन्म की कथा मिलती है। यहां उन्हें शिव कन्या कहा गया है। पद्म पुराण में नर्मदा को अविवाहित कन्या के रूप में पूजा गया है। वायु पुराण में नर्मदा परिक्रमा का उल्लेख मिलता है।
माता नर्मदा की जयंती क्यों मनाई जाती है?
जयंती का अर्थ होता है प्राकट्य दिवस, शास्त्रों के अनुसार माता नर्मदा माघ शुक्ल सप्तमी के दिन पृथ्वी पर प्रकट हुई थी इसीलिए यह दिन उनके जन्म का दिन कहलाता है। अन्य नदियां जहां केवल देवी है वही नर्मदा साक्षात जीवित देवी हैं। उनकी आरती होती है, इनका कन्या के रूप में पूजन होता है। इसीलिए इनका जन्मोत्सव अर्थात जयंती मनाई जाती है। नर्मदा का जल जागृत अवस्था में होता है इनके पूजन से पूर्वजों को तृप्ति मिलती है, इसीलिए नर्मदा जयंती पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है।












