क्या गोवर्धन पूजा 10 नवंबर 2026 के दिन पति-पत्नी शारीरिक संबंध बना सकते हैं? पूजा मुहूर्त, नियम, क्या करें और क्या न करें, और परंपराओं की सच्चाई जानिए।

दिवाली के अगले दिन आने वाली गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहा जाता है, उत्तर और मध्य भारत के बड़े त्योहारों में से एक है। इस दिन गोवर्धन पर्वत, गायों और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा होती है। कई लोग, खासकर नए जोड़े, यह जानना चाहते हैं कि क्या इस दिन पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध बनाना ठीक है।
इसका जवाब सीधा "हां" या "ना" नहीं है, और इसे ईमानदारी से समझना जरूरी है। इस लेख में हम गोवर्धन पूजा की तारीख और मुहूर्त, पूजा विधि, प्रचलित नियम और इस सवाल पर परंपराओं की स्थिति विस्तार से बताएंगे। लेख पूरी तरह जानकारी के लिए है और इसमें कोई एक्सप्लिसिट बात नहीं है।
गोवर्धन पूजा हर साल कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को होती है। इस साल दिवाली रविवार, 8 नवंबर को है और गोवर्धन पूजा मंगलवार, 10 नवंबर 2026 को होगी।
इस साल तारीख को लेकर भ्रम इसलिए है कि अमावस्या 9 नवंबर तक चलती है और प्रतिपदा तिथि 9 नवंबर को दोपहर करीब 12:31 बजे शुरू होकर 10 नवंबर को दोपहर करीब 2:00 बजे तक रहती है। गोवर्धन पूजा प्रातःकाल की प्रतिपदा में होती है, और 9 नवंबर को सूर्योदय के समय अमावस्या है। इसलिए ज्यादातर पंचांगों के अनुसार पूजा 10 नवंबर को होगी। कुछ वेबसाइट्स 9 नवंबर बता रही हैं, जो अधिकांश स्रोतों से मेल नहीं खाता।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| गोवर्धन पूजा / अन्नकूट | मंगलवार, 10 नवंबर 2026 |
| प्रतिपदा तिथि शुरू | 9 नवंबर, दोपहर करीब 12:31 बजे |
| प्रतिपदा तिथि समाप्त | 10 नवंबर, दोपहर करीब 2:00 बजे |
| प्रातःकाल पूजा मुहूर्त (दिल्ली) | सुबह करीब 6:40 से 8:50 बजे |
| दिवाली | रविवार, 8 नवंबर |
| भाई दूज | बुधवार, 11 नवंबर |
मुहूर्त का समय हर शहर में थोड़ा अलग होता है, इसलिए अपने शहर का सटीक समय स्थानीय पंचांग से जरूर देख लें।
पौराणिक कथा के अनुसार वृंदावन के लोग इंद्र की पूजा करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रकृति और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया। इससे नाराज होकर इंद्र ने भारी बारिश की। तब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सभी ब्रजवासियों और गायों की रक्षा की। मान्यता है कि उस दिन कार्तिक मास की प्रतिपदा तिथि थी।
इसी स्मृति में इस दिन गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाकर पूजा की जाती है और भगवान को अन्नकूट, यानी तरह-तरह के पकवानों, का भोग लगाया जाता है। कई मंदिरों में 56 भोग का अन्नकूट बनता है। इसे अन्नकूट, पड़वा या बलि प्रतिपदा भी कहा जाता है।
सुबह स्नान के बाद घर के आंगन या पूजा स्थल पर गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है। उसे फूल, दीप और खिलौनों से सजाया जाता है। फिर रोली, चावल, जल, दीपक और अन्नकूट का भोग अर्पित करके पूजा और आरती की जाती है। गायों और बैलों की भी पूजा होती है।
इसके बाद गोवर्धन की परिक्रमा की जाती है और प्रसाद बांटा जाता है। शाम को कई घरों में तुलसी माता की पूजा और दीपदान भी होता है। एक स्रोत के अनुसार दोपहर 12 से 3 बजे के बीच पूजा करने से बचने की सलाह दी गई है। यह परिवार और पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है।
यह सूची अलग-अलग सार्वजनिक स्रोतों की सामान्य जानकारी पर आधारित है। हर क्षेत्र और परिवार की अपनी परंपरा हो सकती है।

इस सवाल को तीन हिस्सों में समझना बेहतर है।
गोवर्धन पूजा के बारे में छपे ज्यादातर नियमों में पति-पत्नी के संबंध पर कोई सीधा और स्पष्ट निषेध नहीं मिलता। नियमों की चर्चा पूजा की शुद्धता, गौ सेवा, भोग की तैयारी और दान जैसी बातों पर ज्यादा है।
यानी "गोवर्धन पूजा पर संबंध बनाना वर्जित है" जैसा कोई स्पष्ट और सर्वमान्य लिखित नियम हमें नहीं मिला। ऐसे दावों को, खासकर जब वे डर पैदा करने वाले अंदाज में हों, सावधानी से लें।
एकादशी या छठ जैसे कठोर व्रतों के उलट, गोवर्धन पूजा को आम तौर पर उत्सव और कृतज्ञता का पर्व माना जाता है। इसमें अन्नकूट का भोग, पकवान और परिवार के साथ आनंद की परंपरा है। कई परिवार इस दिन उपवास भी नहीं रखते, जबकि कुछ फलाहार के साथ पूजा करते हैं।
इसलिए जिन व्रतों में ब्रह्मचर्य को अलग से बताया जाता है, उनकी तुलना में गोवर्धन पूजा में संयम का जोर कम दिखता है। फिर भी यह परिवार की परंपरा पर निर्भर है।
गोवर्धन पूजा कार्तिक माह में, दिवाली के बाद आती है। कुछ परंपराओं में कार्तिक माह को भक्ति, संयम और दीपदान का समय माना जाता है। इस भावना से कई परिवार दिवाली के आसपास के दिनों में अधिक शुद्धता और अनुशासन रखते हैं। लेकिन यह सबके लिए एक जैसा नहीं है और हमें इसके लिए कोई एकसमान शास्त्रीय नियम नहीं मिला।
परिवार की परंपरा पूछें। अगर आपके घर में किसी खास नियम की परंपरा है, तो अपनी सास, परिवार के बड़ों या पंडित जी से पूछ लें। कई बार हर घर का अपना नियम होता है।
पूजा को प्राथमिकता दें। गोवर्धन पूजा में सुबह की पूजा, गौ पूजा, भोग की तैयारी और परिवार की भागीदारी का काफी महत्व है। दिन का ज्यादातर हिस्सा इसी में बीतता है।
शुद्धता का ध्यान। पूजा और भोग बनाने से पहले स्नान और शुद्धता का नियम सामान्यतः माना जाता है। इसलिए पूजा से पहले साफ-सफाई और स्नान जरूर करें।
आपसी सहमति सबसे जरूरी। किसी भी धार्मिक नियम की आड़ में किसी पर दबाव नहीं डाला जाना चाहिए, चाहे संयम रखने का हो या न रखने का। एक-दूसरे की भावनाओं और आस्था का सम्मान करें।
डर नहीं, श्रद्धा। अगर संयम रखना है, तो उसे बोझ की तरह नहीं, श्रद्धा और अनुशासन की तरह अपनाएं।
कई नवविवाहित जोड़े पहली गोवर्धन पूजा साथ में करते हैं। कुछ घरों में नई बहू के लिए पूजा की खास रस्में होती हैं। ऐसे में ससुराल की परंपरा जानना और उसका सम्मान करना अच्छा रहता है। पति-पत्नी साथ मिलकर पूजा करें, अन्नकूट का भोग तैयार करें और परिवार के साथ त्योहार का आनंद लें। यह उन्हें परंपराओं से जुड़ने का मौका भी देता है।
अगर आप इस दिन फलाहार या उपवास रख रहे हैं, तो ज्यादा थकान या कमजोरी से बचने के लिए पर्याप्त पानी पिएं और आराम का ध्यान रखें। डायबिटीज, ब्लड प्रेशर या किसी बीमारी में उपवास की सीमा तय करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं भी अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।
दिवाली का त्योहार पांच दिन का होता है। इसमें धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दिवाली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज आते हैं। इस साल गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को और भाई दूज 11 नवंबर को है। भाई दूज पर भाई-बहन का त्योहार मनाया जाता है, जिसमें तिलक अपराह्न में करना शुभ माना जाता है। हमारे पिछले लेखों में धनतेरस की खरीदारी और अहोई अष्टमी के नियमों पर भी जानकारी है।