नसीरुद्दीन शाह ने वायरल वीडियो में खुद को ‘दिमागी नक्सल’ बताते हुए केंद्र सरकार की आलोचना की और जामिया, JNU व SRFTI के छात्रों के समर्थन में बयान दिया।

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह एक बार फिर अपने राजनीतिक बयान को लेकर चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में उन्होंने खुद को ‘दिमागी नक्सल’ बताते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के युवाओं का हौसला तोड़ने, शिक्षण संस्थानों को कमजोर करने और लोकतंत्र को खतरे में डालने की कोशिशें की जा रही हैं।
नसीरुद्दीन शाह का यह वीडियो 27-28 अक्टूबर 2026 को मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए व्यापक चर्चा में आया। अपने संदेश में अभिनेता ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI) और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों का जिक्र किया। उन्होंने छात्रों के विरोध प्रदर्शनों के प्रति समर्थन जताते हुए कहा कि उनके साथ हो रहे व्यवहार को याद रखा जाएगा।
"मैं फख्र के साथ बोलता हूं मैं दिमागी नक्सल हूं" ◆ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कहा #NaseeruddinShah | Naseeruddin Shah | Dimagi Naxal https://t.co/O7v2xC4494
— News24 (@news24tvchannel) October 28, 2026
अपने वीडियो में नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’, ‘एंटी-नेशनल’ और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ जैसे नाम दिए जाते हैं। उन्होंने इन आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि वह गर्व के साथ खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहते हैं।
अभिनेता ने अपने बयान में सरकार की आलोचना करते हुए सवाल उठाया कि युवाओं की आवाज दबाने और शिक्षा संस्थानों को कमजोर करने की कोशिशें आखिर कब तक चलेंगी। उन्होंने मौजूदा प्रशासन पर लोकतंत्र को खतरे में डालने का आरोप भी लगाया।
शाह ने अपने संदेश के अंत में देश के युवाओं को सलाम किया और कहा कि उनकी दुआएं छात्रों के साथ हैं। उनके बयान का मुख्य जोर छात्रों के विरोध करने के अधिकार और शिक्षण संस्थानों में असहमति की आवाज को जगह देने पर रहा।
नसीरुद्दीन शाह ने अपने वीडियो में तीन प्रमुख शिक्षण संस्थानों का उल्लेख किया। इनमें दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, कोलकाता का सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट और दिल्ली का जामिया मिल्लिया इस्लामिया शामिल हैं।
अभिनेता ने आरोप लगाया कि इन संस्थानों में विरोध कर रहे छात्रों पर दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि छात्रों के साथ होने वाली घटनाओं को भुलाया नहीं जाएगा।
यहां यह समझना जरूरी है कि छात्रों के साथ कथित दुर्व्यवहार और प्रशासन की कार्रवाई को लेकर लगाए गए आरोप शाह के बयान का हिस्सा हैं। इन आरोपों को स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य मानने से पहले संबंधित संस्थानों और प्रशासन का पक्ष भी देखना जरूरी है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ चुनाव बहाल करने और विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन की खबरें सामने आई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारी छात्र प्रशासनिक फैसलों और अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर अपनी मांगें उठा रहे हैं।
इसी पृष्ठभूमि में नसीरुद्दीन शाह ने छात्रों के समर्थन में बयान दिया है। हालांकि, उनके वीडियो में लगाए गए सभी आरोपों और प्रदर्शन से जुड़े प्रत्येक घटनाक्रम को एक ही दावे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अलग-अलग घटनाओं और संबंधित पक्षों के बयानों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
नसीरुद्दीन शाह इससे पहले भी राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय खुलकर रखते रहे हैं। हालिया विवाद से पहले उन्होंने पश्चिम बंगाल के सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में वीडियो संदेश साझा किया था।
उस बयान में उन्होंने बीजेपी पर उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का आरोप लगाया था, जो उसकी विचारधारा और नीतियों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने SRFTI के छात्रों से जुड़े प्रशासनिक कदमों पर भी सवाल उठाए थे।
इस तरह उनका नया बयान किसी एक वीडियो तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों के आंदोलनों और राजनीतिक असहमति को लेकर उनके लगातार सामने आ रहे रुख का हिस्सा है। हालांकि, उनके आरोपों और संबंधित घटनाओं पर अलग-अलग पक्षों के दावों को ध्यान में रखना जरूरी है।
सोशल मीडिया पर बयान को लेकर दो पक्षों में बंटी राय
नसीरुद्दीन शाह के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान के बाद सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे छात्रों के समर्थन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में दिया गया बयान मान रहे हैं। वहीं, कुछ आलोचक उनके शब्दों और सरकार पर लगाए गए आरोपों से असहमति जता रहे हैं।
इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, छात्र आंदोलनों और सार्वजनिक हस्तियों की राजनीतिक राय को किस तरह देखा जाना चाहिए।
हालांकि, सोशल मीडिया पर किसी बयान को लेकर होने वाली चर्चा अपने आप में जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं करती। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरे वीडियो, उसके संदर्भ और संबंधित पक्षों के बयानों को देखना जरूरी है।
‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक बहस में उन लोगों के लिए किया जाता रहा है, जिन पर नक्सली विचारधारा या उससे सहानुभूति रखने का आरोप लगाया जाता है। हालांकि, इस शब्द का इस्तेमाल कई बार राजनीतिक आलोचना के दौरान भी किया जाता है।
नसीरुद्दीन शाह ने अपने वीडियो में इसी शब्द को दोहराते हुए इसे अपने ऊपर लगाए जाने वाले राजनीतिक लेबल के जवाब के तौर पर इस्तेमाल किया। उनके बयान का अर्थ समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उन्होंने इसे किस संदर्भ में कहा और किन मुद्दों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
सिर्फ किसी व्यक्ति के लिए इस्तेमाल किए गए राजनीतिक विशेषण के आधार पर उसकी विचारधारा या किसी संगठन से संबंध का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
फिलहाल नसीरुद्दीन शाह का वीडियो छात्रों के आंदोलनों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक असहमति को लेकर बहस का विषय बना हुआ है। इस मामले में आगे कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया, संबंधित संस्थानों का बयान या नया घटनाक्रम सामने आता है तो तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि नसीरुद्दीन शाह ने अपने वीडियो में छात्रों का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार की आलोचना की है। उनके बयान पर समर्थन और विरोध दोनों सामने आ रहे हैं, लेकिन पूरे मामले को समझने के लिए आरोपों, तथ्यों और सभी संबंधित पक्षों के बयानों को अलग-अलग देखना जरूरी है।