Adhik maas vs kharmas : अधिक मास और खरमास को लेकर लोगों में अक्सर भ्रम बना रहता है। चूंकि ये दोनों महीने हिंदू पंचांग में समय-समय पर आते रहते हैं, इसलिए लोग अक्सर इन्हें एक ही समझ लेते हैं। हालाँकि, इनकी गणना की विधियाँ, समय और धार्मिक महत्व पूरी तरह से अलग हैं।

एक ओर अधिक मास को भक्ति और आध्यात्मिक साधना के लिए एक विशेष समय माना जाता है, वहीं दूसरी ओर खरमास शुभ मांगलिक कार्यों पर रोक लगा देता है। अधिक मास का उद्देश्य चंद्र और सौर गणनाओं में संतुलन बनाना है, वहीं खरमास का संबंध सूर्य के कुछ विशेष राशियों में गोचर से है। आइए विस्तार से जानते हैं कि अधिक मास और खरमास में क्या अंतर है और ये महीने कब-कब आते हैं।

 

अधिक मास क्या है?

ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, एक सौर वर्ष में लगभग 365 दिन होते हैं, जबकि एक चंद्र वर्ष में लगभग 354 दिन होते हैं। इस अंतर को समायोजित करने के लिए, लगभग हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। इस महीने को ‘अधिक मास’ के नाम से जाना जाता है। जिस महीने में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती, उस महीने को ही ‘अधिक मास’ के रूप में निर्धारित किया जाता है।

अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और इसे भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस महीने में पूजा-पाठ करने, व्रत रखने और दान-पुण्य करने से कई गुना अधिक आध्यात्मिक फल प्राप्त होते हैं। हालाँकि, इस दौरान विवाह जैसे शुभ मांगलिक कार्य आमतौर पर नहीं किए जाते, फिर भी इसे आध्यात्मिक अनुशासन और साधना के लिए अत्यंत शुभ समय माना जाता है।

Adhik maas vs kharmas
Adhik maas vs kharmas

खरमास क्या है?

खरमास एक विशिष्ट ज्योतिषीय घटना है, जो वर्ष में दो बार घटित होती है। इस काल को ‘खरमास’ तब कहा जाता है, जब सूर्य धनु (Sagittarius) या मीन (Pisces) राशि में प्रवेश करता है। यह अवधि लगभग एक महीने तक चलती है, और तब समाप्त होती है, जब सूर्य बाद में मकर (Makar) या मेष (Mesh) राशि में प्रवेश करता है। खरमास के दौरान शुभ कार्य क्यों रोक दिए जाते हैं?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, खरमास के दौरान सूर्य की गति धीमी हो जाती है, जिससे यह अवधि शुभ कार्यों के लिए प्रतिकूल मानी जाती है। परिणामस्वरूप, इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार और अन्य शुभ अनुष्ठानों जैसे समारोहों को करने पर रोक होती है।

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दोनों के बीच मुख्य अंतर

अधिक मास हर तीन साल में एक बार आता है और यह चंद्र-सौर पंचांग प्रणाली द्वारा संचालित होता है, जबकि खरमास साल में दो बार आता है और यह सूर्य के गोचर पर आधारित होता है। अधिक मास को भक्ति और आध्यात्मिक विकास का समय माना जाता है, जबकि खरमास को आत्म-संयम और विश्राम की अवधि माना जाता है।

 

दान का विशेष महत्व

इन दोनों अवधियों के दौरान दान का विशेष महत्व होता है। ऐसा माना जाता है कि दान-पुण्य के कार्य व्यक्ति को मानसिक शांति प्रदान करते हैं। विशेष रूप से, अधिक मास के दौरान दान, पुण्य कर्म, मंत्र जाप और तपस्या करने से सकारात्मक और लाभकारी परिणाम प्राप्त होते हैं।