सलीम खान : हिंदी सिनेमा में पर्दे के पीछे भी कई सारे नाम ऐसे हैं जिनके हुनर ने ना जाने कितने स्वर्णिम अध्याय भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को दिए। इनमें से कुछ लेखक हैं तो कुछ कोरियोग्राफर, कुछ सिंगर हैं तो कुछ लिरिक्स राइटर और ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अपनी कलम के दम पर न जाने कितने सुपरस्टार पैदा किये और फिल्म इंडस्ट्री की दिशा बदल दी।आज हम बात कर रहे हैं हिंदी फिल्म जगत के मशहूर लेखक और सलमान खान के पिता सलीम खान के बारे में।
1970 से 80 के दशक में सलमान खान के पिता सलीम खान और फरहान अख्तर के पिता जावेद अख्तर की जोड़ी बनी। इस जोड़ी को भारतीय फ़िल्म जगत सलीम-जावेद की जोड़ी के नाम से जानता है। इस जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को ही एंग्री यंग मैन दिया और दिए ऐसे-ऐसे दमदार डायलॉग जो आज भी क्लासिक माने जाते हैं।
सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी का कमाल
सलीम खान और जावेद अख्तर की इस जोड़ी ने लंबे समय तक साथ में काम किया और उसके बाद आपसी मतभेद के चलते अपने रास्ते अलग कर लिए। हालांकि प्रोफेशनल रिश्ते खत्म हुए पर पर्सनल बांड वैसे ही बने रहे। सलीम खान की इन बेस्ट फिल्मों की वजह से केवल बॉक्स ऑफिस को हिट नहीं मिले बल्कि सलीम खान को कई पुरस्कार और सम्मान भी मिलते रहे। आईए जानते हैं उनकी उन्हीं फिल्मों के बारे में जिन्होंने इतिहास भी रचा और अवार्ड भी जीते।
सलीम खान की लिखीं वो फिल्में जो कल्ट क्लासिक बन गईं
जंजीर: 1973 में अमिताभ बच्चन की जंजीर मूवी आई। इस मूवी के एक-एक डायलॉग ने हिंदी सिनेमा की तस्वीर बदल दी। सलीम जावेद की इस कहानी ने पारंपरिक रोमांटिक हीरो की छवि को हटाकर भारतीय फ़िल्म जगत को दिया एक गुस्सैल, सिस्टम से लड़ने वाला नायक। इस फिल्म को जबरदस्त सफलता मिली और इस फिल्म को फिल्म फेयर में कई नॉमिनेशन भी मिले। यह फ़िल्म सलीम खान की सबसे बेस्ट फिल्म मानी जाती है। क्योंकि इस फिल्म ने बॉलीवुड में रोमांस से ज्यादा एंगर का तड़का मौजूद था।
दीवार : आज मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, दौलत है, तुम्हारे पास क्या है? मेरे पास मां है। इस डायलॉग पर बनी रीलें तो सभी ने देखी होगी। जानते हैं, इस डायलॉग को लिखने वाले कोई और नहीं बल्कि सलीम-जावेद ही थे। दीवार फिल्म की कहानी, उसके डायलॉग भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में एक नया लेवल सेट करने के लिए जाने जाते हैं। इस फिल्म को फिल्म फेयर बेस्ट स्टोरी अवार्ड मिला और यह आज फ़िल्म भारतीय सिनेमा की कल्ट फिल्मों में से एक गिनी जाती है। इस फिल्म ने भारतीय फ़िल्म जगत को एक नई सोच की तरफ आकर्षित किया। भाई मां जैसे रिश्तो को फिल्मों में इस्तेमाल करना सिखाया।
शोले: 1975 में भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर शोले रिलीज हुई। शोले जय-वीरू की दोस्ती, गब्बर सिंह का खौफ, ठाकुर का बदला यह सब कुछ अमर हो गया। इस फिल्म को फिल्म फेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। शोले ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। यह फिल्म भारत की कल्ट मूवीस में सबसे टॉप पर गिनी जाती है। फ़िल्म शोले के जय-वीरू असल में सलीम खान के कॉलेज के दो मित्रों के नाम थे। इसीलिए यह फिल्म सलीम खान की दिल के बेहद करीब मानी जाती है।
डॉन: ‘डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है’, यह डायलॉग अपने डॉन 2 में भी सुना होगा लेकिन डॉन 2 की नींव रखी 1978 में बनी डॉन मूवी ने। इस फिल्म ने अपराध और सस्पेंस की दुनिया को नए अंदाज में पेश किया। इस फिल्म को भी फिल्म फेयर में बेस्ट स्टोरी के लिए नॉमिनेशन मिला। सलीम खान की इस कहानी में ट्विस्ट, डबल रोल, दमदार डायलॉग देखने को मिले। आज भी इस फिल्म के रीमेक और रिबूट लगातार पेश किए जा रहे हैं। वर्तमान में डॉन 3 का चर्चा भी अब जोर पकड़ चुका है।
त्रिशूल: 1978 में सलीम खान की त्रिशूल फिल्म पारिवारिक संघर्ष को दिखाती है। इस फिल्म में भी अमिताभ बच्चन को ही कास्ट किया गया था। यह फिल्म एक बेटे के बदले की फिल्म है जो पिता से न्याय चाहता है। फिल्म में दमदार डायलॉग और ऐसी स्क्रिप्ट रची गई कि लोग आज तक इस फिल्म की तारीफ करते हैं।
क्यों ठुकराया पद्मश्री पुरस्कार
हालांकि सलीम खान को व्यक्तिगत रूप से ज्यादा अवार्ड नहीं मिले लेकिन उन्हें कई फिल्म फेयर अवार्ड और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिल चुका है। 2010 में उन्हें पद्मश्री पुरुस्कार से भी सम्मानित किया गया, लेकिन सलीम खान ने इस अवार्ड को लेने से मना कर दिया। उनका कहना था कि वह इससे ज्यादा सम्मान के हकदार हैं। सलीम खान वर्तमान में बॉलीवुड में एक्टिव रोल नहीं प्ले कर रहे हैं। लेकिन आने वाले कई दशकों तक सलीम खान को उनकी क्लासिक मूवीज और डायलॉग राइटिंग के लिए जाना जाएगा। क्योंकि उनकी लिखी फिल्मों के डायलॉग आज भी भारतीय सिनेमा की आत्मा में बसते हैं।

