Kisan Advice: गर्मी आते ही बाज़ार में हरी सब्ज़ियों की डिमांड तेज़ी से बढ़ जाती है। इस समय जल्दी पकने वाली सब्ज़ियों की खेती करने से किसान कम समय में अच्छी कमाई कर सकते हैं। तुरई ऐसी ही एक सब्ज़ी है, जिसे गर्मियों में बहुत फ़ायदेमंद माना जाता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि मार्च में इसकी बुवाई करने से फसल लगभग 50 से 60 दिन में तैयार हो जाती है, और किसानों को अच्छी पैदावार मिल सकती है।
कई इलाकों में रबी सीज़न के बाद खेत खाली हो जाते हैं। किसान इन खाली खेतों में तुरई की खेती कर सकते हैं। इससे न सिर्फ़ खेत खाली रहते हैं बल्कि एक्स्ट्रा इनकम का अच्छा मौका भी मिलता है। गर्मियों में तुरई की बाज़ार में लगातार डिमांड रहती है, इसलिए किसानों को अच्छे दाम भी मिलते हैं।
अगर किसान सही टेक्नोलॉजी और अच्छी वैरायटी चुनें, तो तुरई की खेती से बहुत अच्छी पैदावार हो सकती है। कई बेहतर वैरायटी हैं जो जल्दी पक जाती हैं और किसानों को बेहतर पैदावार देती हैं।
खेती के लिए सही मिट्टी और मौसम ज़रूरी
तुरई की फसल गर्म, हल्की नमी वाले मौसम में अच्छी तरह उगती है। इसके लिए आसानी से पानी निकलने वाली मिट्टी सबसे अच्छी होती है। रुका हुआ पानी पौधे की जड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तुरई की खेती के लिए मिट्टी का pH वैल्यू 6.5 से 7.5 के बीच सबसे अच्छा माना जाता है। खेत की अच्छी तरह जुताई करने और गोबर या ऑर्गेनिक खाद डालने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है और पौधे तेज़ी से बढ़ते हैं।

जल्दी पकने वाली बेहतर किस्में
तुरई की कुछ किस्में बहुत जल्दी पक जाती हैं, जिससे किसान जल्दी पैदावार शुरू कर सकते हैं। इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट की बनाई पूसा सुप्रिया ऐसी ही एक किस्म है। यह लगभग 50 दिनों में फल देना शुरू कर देती है और प्रति हेक्टेयर लगभग 130 से 140 क्विंटल पैदावार दे सकती है। यह किस्म कई बीमारियों को भी झेल सकती है।
इसी तरह, पंत चिकनी तोरई-1 पंतनगर एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी की बनाई एक पॉपुलर किस्म है। इसके फल लंबे और आकर्षक होते हैं, जिन्हें आसानी से बेचा जा सकता है। यह वैरायटी लगभग 50 से 55 दिनों में पक जाती है और प्रति हेक्टेयर लगभग 140 से 170 क्विंटल पैदावार दे सकती है।
ज़्यादा पैदावार वाली वैरायटी
पूसा चिकनी वैरायटी उन किसानों के लिए एक अच्छा ऑप्शन है जो ज़्यादा पैदावार चाहते हैं। इस फसल को पकने में लगभग 60 से 70 दिन लगते हैं, लेकिन इसकी पैदावार काफी अच्छी होती है। यह प्रति हेक्टेयर लगभग 150 से 200 क्विंटल पैदावार दे सकती है।
वाराणसी के इंडियन वेजिटेबल रिसर्च इंस्टीट्यूट की बनाई काशी दिव्या भी एक बेहतर वैरायटी है। यह वैरायटी उन इलाकों के लिए खास तौर पर सही मानी जाती है जहाँ डाउनी मिल्ड्यू जैसी बीमारियों का खतरा ज़्यादा होता है। लगभग 60 दिनों में पकने वाली यह वैरायटी प्रति हेक्टेयर 130 से 160 क्विंटल पैदावार दे सकती है।
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किसानों के बीच एक पॉपुलर वैरायटी
कानपुर एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी की बनाई कल्याणपुर हरी चिकनी भी एक ज़्यादा पैदावार वाली तोरई की वैरायटी मानी जाती है। इसके फल अच्छी क्वालिटी के होते हैं और मार्केट में इसकी अच्छी डिमांड है। इस किस्म में प्रति हेक्टेयर 200 से 220 क्विंटल पैदावार की क्षमता है, इसीलिए कई किसान इसकी खेती को प्राथमिकता देते हैं।
कम लागत में बेहतर इनकम का मौका
तुरई की खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह सस्ती है और फसल जल्दी पक जाती है। बाजार में इसकी मांग लगातार बनी रहती है, इसलिए किसानों को इसे बेचने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती।
जानकारों का मानना है कि अगर किसान मार्च के महीने में वैज्ञानिक तरीके से बेहतर किस्मों के साथ तुरई की खेती करें, तो वे कम समय में अच्छी इनकम कमा सकते हैं। यही वजह है कि कई किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ सब्जी की खेती को भी अपनी इनकम बढ़ाने का बेहतर तरीका मान रहे हैं।












