देश डिजिटल इंडिया, स्मार्ट गांव और 5G इंटरनेट की बात कर रहा है, लेकिन मध्य प्रदेश के मंडला जिले का एक आदिवासी इलाका आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। यहां साल 2026 में भी करीब 100 आदिवासी परिवार बिना बिजली के जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। मंडला जिले की भानपुर ग्राम पंचायत के गवारी और जमनाही टोला में सूरज ढलते ही पूरा इलाका अंधेरे में डूब जाता है। गांव में बिजली के खंभे तो लगे हैं, लेकिन उनमें आज तक करंट नहीं दौड़ा। ग्रामीणों के लिए ये खंभे विकास नहीं, बल्कि अधूरे सरकारी वादों की याद दिलाते हैं।
अंधेरे में बचपन, धुएं में पढ़ाई

गांव के बच्चे आज भी टॉर्च और चूल्हे की रोशनी में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। जिन बच्चों के हाथों में आज तकनीक और डिजिटल शिक्षा होनी चाहिए, वे धुएं और मिट्टी के बीच अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं।
ग्रामीण कमला बाई मरावी कहती हैं, हमारे बच्चे अंधेरे में बड़े हो रहे हैं। रात होते ही पूरा गांव जैसे बंद हो जाता है। वहीं किसान रामू उइके बताते हैं कि कई बार अधिकारियों को आवेदन दिए गए, जनसुनवाई में भी पहुंचे, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला।
मंडला: 10 साल पहले लगे थे बिजली के खंभे, आज तक नहीं आई रोशनी
ग्रामीणों के मुताबिक करीब 10 साल पहले गांव में बिजली के खंभे लगाए गए थे। उस समय लोगों को उम्मीद थी कि अब उनका गांव भी रोशन होगा, लेकिन आज तक बिजली सप्लाई शुरू नहीं हुई है।
गांव के बुजुर्ग माखन सिंह कहते हैं, हम पैदा हुए तब भी गांव अंधेरे में था और अब बूढ़े हो गए, तब भी अंधेरा ही है।
बच्चों का सवाल: क्या गांव में पैदा होना हमारी गलती है?

गांव के बच्चों के सवाल व्यवस्था पर सीधे सवाल खड़े करते हैं। 12 साल के राहुल मरावी का कहना है, क्या हम गांव में पैदा हुए इसलिए हमारे हिस्से बिजली नहीं आई वहीं छात्रा सीता बाई बताती हैं, स्कूल में ऑनलाइन पढ़ाई की बात होती है, लेकिन यहां मोबाइल चार्ज तक नहीं हो पाता।
मोबाइल चार्ज करने के लिए 5 किलोमीटर का सफर
आज के दौर में मोबाइल जरूरत बन चुका है, लेकिन इस गांव में फोन चार्ज करना भी बड़ी चुनौती है। ग्रामीणों को मोबाइल चार्ज करने के लिए 3 से 5 किलोमीटर दूर दूसरे गांव जाना पड़ता है। इसके लिए हर बार 10 से 15 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। कई बार फोन बंद होने के कारण बीमारी या इमरजेंसी में समय पर मदद भी नहीं मिल पाती।
शादी और त्योहार भी अंधेरे में

गांव में शादी हो, त्योहार हो या कोई सामाजिक कार्यक्रम, सब कुछ अंधेरे में ही होता है।
आदिवासी किशन आरसे बताते हैं, हमने इस गांव में कभी जलता हुआ बिजली का बल्ब नहीं देखा।
बुजुर्गों का कहना है कि शाम होते ही लोग घरों में कैद हो जाते हैं। आसपास घना जंगल होने की वजह से रात में डर का माहौल रहता है।
बिजली ही नहीं, पानी और सड़क की भी भारी समस्या
ग्रामीणों के मुताबिक गांव में सिर्फ बिजली की ही समस्या नहीं है। पानी और सड़क की हालत भी बेहद खराब है।
- बारिश में गांव का संपर्क कट जाता है
- महिलाएं दूर के नालों और झिरियों से पानी लाती हैं
- कई बार लोगों को गंदा पानी पीने पर मजबूर होना पड़ता है
अधिकारियों ने जांच की बात कहकर झाड़ा पल्ला
जब इस पूरे मामले पर जिला पंचायत CEO शाश्वत मीणा से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि गांव में बिजली और पानी की समस्या की शिकायत मिली है। उन्होंने कहा कि मामले की जांच कराई जाएगी और समस्या का समाधान किया जाएगा। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से यही आश्वासन सुनते आ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल: विकास की तस्वीर से बाहर क्यों हैं ये गांव?
सरकार हर घर बिजली, डिजिटल इंडिया और ग्रामीण विकास की बातें करती है। लेकिन मंडला के ये आदिवासी गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन परिवारों का कसूर क्या है? क्या इन बच्चों का भविष्य अंधेरे, धुएं और अधूरी उम्मीदों तक ही सीमित रह जाएगा? यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उन इलाकों की हकीकत है जो आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर हैं।













